Sunday, October 17, 2010

आसमाँ से उतर आइये

आसमाँ से उतर आइये
आइये मेरे घर आइये.

फिर न लौटेंगे, वादा करें,
मेरे आँगन अगर आइये.

रिश्ते नाते भुला गर सकें,
शौक़ से फिर शहर आइये.

शौके दीदार परवां चढ़े,
ख़्वाब में रात भर आइये.

मैं हूँ मुश्ताक कहिये कभी,
जाने मन टुक इधर आइये. (टुक-ज़रा)

5 comments:

  1. बहुत बढ़िया...

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  2. Regarding Siddharth ji..! aapki lekhani padhkar natmastak ho gaya..! aapse ek nivedan ki apni kuchnayen 'aakhar kalash' ke liye preshit kar sudhi pathakon ko unkee umda kaavy rasaaswadan kee utkantha ko shant jaroor keejiyega..
    sadar !

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  3. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा , हिंदी ब्लॉग लेखन को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सार्थक है. निश्चित रूप से आप हिंदी लेखन को नया आयाम देंगे.
    हिंदी ब्लॉग लेखको को संगठित करने व हिंदी को बढ़ावा देने के लिए "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" की stha आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें. यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच

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  4. अच्छा लगा/...

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